शासक से शोषण तक के सफरः- के इतिहास में ‘‘कभी थे सरकार आज मांग रहे अधिकार‘‘ कैसे हुआ ?

महिलाओं का सम्मान करना चाहिए पर समाज की
भागीदारी में इनका भी योगदान महत्वपूर्ण है ‘‘दि ग्रेट खरवार‘‘ जैसी पुस्तके आज आधुनिक युग परिवर्तन का द्योतक है। माननीय श्री विजय प्रसाद जी की धर्मपत्नी लेखिका सुश्री वंदना जी ने इस मुहिम में आगे बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है जो प्रेरणा श्रोत है। समाज के शिक्षित एवं जागरूक महिलाओं को आमंत्रित किया जाता है कि आप मानव जीवन प्रथम पाठशाला हैं सुरक्षा के साथ-साथ अपने नावजात शिशु, किशोर एवं युवाओं को शिष्टाचार एवं सेवा भावना के प्रति अग्रसर करें और एक विकसित समाज के संरचना में आप बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाए। आपको शोषण का समय समाप्त करना है और शासक बनकर उभरना है।
कभी थे सरकार आज मांग रहे अधिकार:- शीर्षक में पुरातात्विक सर्वेक्षक डी.आर. भण्डारकार ने लिखा है कि ‘‘वन जातियाँ खरवार’’ का शासन वघेलखण्ड से लेकर उड़िसा के समुद्र तट था। (भण्डारकर डी.आर.1923) मिर्जापुर गजेटियर (1984) लिखते है कि रोहतासगढ़ और उसके संलग्न क्षेत्रों में इससे संबंधित कई पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। सर्च रिपोर्ट में ‘‘प्रताप धवलदेव’’ रोहतासगढ़ का दुर्गपति (शासक) थे। ताराचेड़ी शिलालेख रोहतासगढ़ और उसके संलग्न क्षेत्रों में इससे संबंधित कई पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
खरवार वंश के विशेष जानकारी के लिए ‘‘शिलालेखों’’ और संदर्भो का अध्ययन आवश्यक होगा। खरवार, उराव, मुण्डा, संथाल, हो, वीरहोर, खारिया, शवर, वैगा इत्यादि एक ही वर्ग की जनजातियाँ हैं जो मूल रूप से कैमूर पहाडियों के सुदूर अंचलों, सोनगंगा की घाटियों वर्तमान (झारखण्ड) बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़, राजस्थान एवं उड़ीसा के उपात्यका में न जाने कब से निवास कर रही है। ( एफ ई पारटिगर 1962) ने अपने रिसर्च में लिखा है कि मनू के 9 पुत्रों में एक ‘‘करूष’’ थे जैसा कि महाभारत में वर्णन आया है। विन्ध्यक्षेत्र करूष देश के नाम से जाना जाता है। करूष बंशियों ने महाभारत में कौरवों का साथ दिया था। इस बंश में ‘‘फिजुल खर्ची’’ की आदत राजवंशी होने के कारण प्रारम्भ काल से रहने से इस बंश के गौरवबोध एवं स्वाभिमान भावना का कुट-कुट कर भरा हुआ परिलक्षित होता है।
भागवत पुराणा मानता है कि:- करूष लोग दृढ़ धर्मरक्षक एवं शक्तिशाली योद्धा हुआ करते हैं (मिर्जापुर गजेटियर 1984)
एफ.ई.पार्टियर 1962 ने लिखा है कि ‘‘सोनभद्र किसी युग में करूषों (खरवारों) के आधीन रहा है। खरवार सम्राज्य का विस्तार सोन नदी से होता हुआ रीवा जनपद तक था। पूरे कैमूर घाटी इसमे सामिल है। (रामनाथ शिवेन्द्र 2005) के रिसर्च रिपोर्ट में उल्लेखित है कि खरवारों का अधिवास- रीवा, शाहाबाद, पुण्ड्रदेश और विंध्याचल परिक्षेत्र था।
कैमूर (आर्कियोलाॅजी डिस्ट्रिक्ट गजेटिर 2001) यह एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट है जिसमें खरवार वंश के दो राजाओं ‘‘प्रताप धवल देव’’ और ‘‘ इन्द्रधवल देव’’ सामन्तों के माध्यम से ताम्रपत्र जारी किया गया। खरवार राजवंश का संस्थापक खादिरपाल थे। 12वीं सदी में खरवार राजा मदनपाल थे जो वेतरावती (वर्तमान में वेतना) नदी के तट पर है। जिनके यहाँ राजा बारीमल और पारीमल ने युद्ध में चन्देल चैहान से पराजित होने के बाद शरण ली। उड़नदेव मदनपाल के पुत्र थे जो अंगोरी को हराकर 1310 ई0 में कन्नित (वर्तमान में मिर्जापुर) के राजा हुए। बालन्दशाह के बंशज रीवा से माड़वास चले गये जहाँ आजादी के पूर्वतक शासक बने रहे।
किलहार्न के अनुसार श्री प्रताप जिसे महानायक प्रताप धवल के नाम से जाना जाता है। इन्होने अपने शिलालेख में जो उल्लेखित किया है जिसमें इनका नाम यवन दलन (यवनों का नाश करने वाला) कहा गया है उन्होने ‘‘बख्तियार खिलजी के पुत्र मुहम्मद को हराया था क्योंकि ‘‘तबकाय नासरी’’ में मुहम्मद ने गंगा और करमनाशा नदियों के बीच भागवत और भईली की जागीर 1199 ई0 में प्राप्त की थी। इस अभिलेख के माध्यम से इन विशिष्ट बातों का पता चलता है कि खरवार राजबंशों ने मुस्लिम आक्रान्ताओं से लगभग 37 वर्षो तक भीषण युद्ध करता रहा (डा. भगवान सहाय 1962)।
खरवार राज्य का हªास का कारण यवन (मुस्लिम वंश) रहा है। खरवारों का शासन काल 1161 इ0 से 1596 ई0 तक 435 वर्ष रहा है।
1661 ई0 में दाउद खाँ पलामु में चेरो राजाओं को अपने आधीन कर लिया। रानी दुर्गावती को आसफ खाँ से लड़ना पड़ा। मध्यकाल में वन राज्यों का शरण प्रारंभ हुआ। 18वीं सदी तक शासन का पूर्णतः समाप्त प्राय हो गया। (मिर्जापुर गजेटियर 1984)
सामाजिक और राजनैतिक आंदोलनः-
खरवार जनजाति हमेशा से स्वतंत्र रहना पसंद करती है। वे अपने जंगल और जमीन के मालिक थे शारीरिक बल और कौशल से जंगलों को साफ कर खुंखार वन्य पशुओं से उस क्षेत्र को मुक्त कराकर कृषक बन गये थे। उस समय उनको अपने जमीन का कोई राज्य ‘कर’ नहीं देना पड़ता था न ही जंगलों में जाने और वन्य पदार्थाे के उपयोग पर कोई पाबंदी थी। परन्तु मुगल शासन के द्वारा धोखे करने के कारण उनहे खतरे नजर आने लगे। शेरशाह द्वारा धोखे से उनसे रोहतासगढ़ ले लिया गया और वे काफी संख्या में वहाँ से पलायन करके सोनघाटी तथा पलामू में चेरों सरदारों के साथ मुगल बादशाहों से अपने आजादी के लिए लड़ते रहे। यहाँ तक की अंग्रेजों के शासन काल में इन्होने आजादी के लिए खुलकर विद्रोह किया।
1857 के सिपाही विद्रोह में खरवारों ने अंगेे्रजी हुकुमद के विरोध में विद्रोह किया। 1917 एवं 1950 के तानाभगत आंदोलन में भी खरवार शामिल हुए। समकालीन आंदोलन में बिरसामुण्डा झारखण्ड एवं शहीद वीर निलाम्बर और पिताम्बर दोनो भाईयों को अंग्रेजी हुकुमत ने बिना न्याय दिय 25 साल की उम्र में ही फांसी पर लटका दिया।
इस तरह खरवार जनजाति एक स्वतंत्र चेतना और सामाजिक राजनैतिक जीवन पर जागरूक जनजाति है। उनका आवास क्षेत्र दुरूह होते हुए भी सुरक्षित था। यह समुुदाय कितना भी गरीब क्यों न हो पर भीख नहीं मांग सकती। जनजाति पहाडी, पठारी एवं मैदानी एवं बनाच्छादित क्षेत्र में आकर बस गए। उस समय वह क्षेत्र घने जंगलो, अनेक प्रकार के वृक्षों और अनेक वन्य पशुओं से भरा था। उस समय कृषि के साथ-साथ शिकारी जीवन से जुडे हुए थे। वहाॅं के जंगल और जमीन पर खरवार बंश का एकछत्र आधिपत्य था। राज्य विघटन के बाद वे दुर्धष सैनिक के रूप में अपना पहचान लिए। उनहें काफी जागी भी मिली परन्तु कालान्तर में जंगल कटने और वनों से प्राप्त होने वाली संसाधनों का आभाव होता गया। बनों के कटने के कारण अधिकांश भाग सुखे के चपेट में आ गये और खरावरों की आर्थिक स्थिति सुखे और आकाल के कारण खराब होती गई। बनों से मिलने वाले फल-फुल, कंद-मुल, पशु-पक्षी आदि की उपलब्धता में कमी आई जिसके कारण खरावार राजवंश की आर्थिक स्थिति दिनों-दिन दीनहिनता में बदलती गई। यहाँ तक की स्वतंत्रता के बाद भी अधिकार विहिन जीवन राज्यों से प्राप्त हुआ। यह दुर्भाग्य है।
शासक से शोषण तक का सफर की यह संक्षिप्त विवरण है। आगे अगले अंक में आप अध्ययन कर सकते हैं।

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